Quran Vatika


Quran Vatika – कुरान में दिये गये पौधों का वर्णन

कुरान में दिये गये कुछ पौधों का वर्णन किया जा रहा है-

 

  • खजूर : खजूर का अरबी नाम ”नख्ल” और ”तमर” है। खजूर मनुष्य के लिए एक अच्छा आहार है। इसकी पौष्टिकता का पता इसके वैज्ञानिक चिकित्सकीय विश्लेषण से होता है। इसके फल में लगभग 60 प्रति. इनवर्ट सुगर और स्यूक्रोस के अतिरिक्त स्टार्च, प्रोटीन और वसा काफी मात्रा में मिलता है। इसके साथ ही विटामिन ”ए”, विटामिन ”बी”, विटामिन ”बी2″ और विटामिन ”सी” भी पाये जाते हैं। इसमें सोडियम, कैल्सियम, सल्फर, क्लोरीन, फासफोरस और आईरन का पर्याप्त मात्रा में होना इसकी पौष्टिकता को प्रमाणित करता है। फलों में खजूर को पूर्ण भोजन समझा जाता है।

 

    • हज़रत मोहम्मद साहब ने एक जगह फरमाया ”तुम खजूर नेहार मुँह खाया करो, ऐसा करने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।”
    • ”खजूर खाने से गठिया का रोग नहीं होता।”-हजरत मोहम्मद साहब
    • हजरत मोहम्मद साहब ने फरमाया ”खजूर में हर बीमारी से शिफा (छुटकारा) है, निहार मुँह खाने से यह जहरों को मारता है। इस पेड़ का उल्लेख कुरान शरीफ में लगभग तीस बार किया गया है।”
    • कुरान की सूरह नहल- 10-11 में उल्लेख है- ”अल्लाह वही है, जिसने पानी बरसाया, जिससे तुम्हें पीने को मिलता है और जिनसे सब्ज़ा ज़ार पैदा होते हैं और जिनमें तुम मवेशी चराते हो और उसी से तुम्हारे लिये खेती उगाते हैं। साथ ही जैतून, खजूर, अंगूर हर किस्म के फल मिलते हैं। बेशक इसमें बड़ी निशानी है, उन लोगों के लिए जो सोचने की सलाहियत (योग्यता) रखते हैं।”
  • जैतून : जैतून का अरबी नाम में जैत या अल-जैतून है। जैतून के कच्चे फल चटनी और अचार बनाने के काम में लाये जाते हैं। इसके पके हुए फल बहुत मीठे और स्वादिष्ट होते हैं। जैतून के तेल को खाने से मेदे की तेज़ाबियत दूर होती है। यह अल्सर को मिटाता है, चर्म रोगों में और मुख्यत: दाद जैसे चर्म रोगों के लिए बहुत लाभदायक है।

 

    • हज़रत मोहम्मद साहब ने जैतून के सम्बन्ध में कहा है कि जैतून का तेल खाने में भी इस्तेमाल करो और मालिश में भी, इसलिए कि यह मुबारक (सम्मान योग) तेल है।
    • हज़रत मोहम्मद साहब ने एक बार फरमाया ”जैतून का तेल खाओ, उसे लगाओ, यह पाक और मुबारक है।” जैतून का उल्लेख कुरान शरी$फ में चार बार किया गया है।

 

  • अंगूर : अंगूर को अरबी भाषा में ”एनब” कहा जाता है। अंगूर ग्लूकोज़ और फ्रक्टोज़ प्राप्त करने का साधन है, यह तत्त्व अंगूर में 15 प्रतिशत से 25 प्रतिशत पाये जाते हैं। इसमें टारटरिक एसिड और मैलिक एसिड भी पर्याप्त मात्रा में मौजूद है, सोडियम, पौटेशियम, कैल्शियम और आइरन की मात्रा भी इसमें पाई जाती है। आर्थिक दृष्टि से इसकी खेती बहुत लाभदायक है। हज़रत मोहम्मद साहब के जमाने में अंगूर की खेती मदीना व मक्का में बड़े पैमाने पर होती थी। कुरान शरीफ में इसका उल्लेख ग्यारह बार किया गया है।

 

  • अनार : अनार का अरबी नाम ”रुम्मान” है। अनार एक अद्भुत और कीमती फल है। इसका पेड़, पत्तियाँ, फल सभी चिकित्सकीय दृष्टि से लाभप्रद हैं। इस फल में बड़ी मात्रा में शक्कर (ग्लूकोज़-फ्रक्टोज़) के अतिरिक्त मुख्य रूप से थायमिन और राइबोफ्लेविन और विटामिन ”सी” भी अच्छी मात्रा में पाया जाता है। फासफोरस, सोडियम, कैल्शियम, सल्फर, ऑक्जेलिक अम्ल और केरोटीन प्राप्त करने का अनार एक अच्छा साधन है। आर्थिक दृष्टि से इस की खेती बहुत लाभदायक है।
    • हज़रत मोहम्मद साहब ने फरमाया ”अनार खाओ … यह मेदे (लिवर) को नया जीवन देता है, जिसने अनार खाया अल्लाह ” (ईश्वर) उसके दिल को रोशन कर देगा।”
    • मोहम्मद साहब ने एक जगह कहा है कि ऐसा कोई अनार नहीं होता, जिसमें ज़न्नत के अनारों का दाना शामिल न हो। अनार हृदय के मरीजों के लिए बहुत लाभदायक है, जिसका उल्लेख कुरान शरीफ में तीन बार किया गया है।

 

  • अंजीर : अंजीर को अरबी भाषा में ”तीन” कहा जाता है। अंजीर एक स्वादिष्ट मेवा है। इसके शुष्क फलों में 50 प्रति. से अधिक शक्कर होती है। इसके अतिरिक्त थोड़ी मात्रा में सीट्रिक एसिड, मैलिक एसिड भी इनमें मिलते हैं। एक बहुत महत्त्वपूर्ण तत्त्व फेसिन  (Ficin) पाया जाता है। जो पेट के रोगों में बड़ा लाभदायक है। गुर्दों को साफ करता है।
    • हज़रत मोहम्मद साहब के पास कहीं से अंजीर से भरा हुआ थाल आया, उसे देखकर आपने फरमाया अगर कोई कहे कि कोई फल ज़न्नत से ज़मीन पर आ सकता है तो मैं कहूँगा कि यही वह है, क्योंकि अंजीर विलाशुबह  (नि:संदेह) ज़न्नत काा मेवा है।
    • अंजीर बवासीर खत्म करता है और जोड़ों के दर्द (गठिया) में भी लाभ पहुँचाता है। इसका उल्लेख कुरान शरीफ की सूरा ”तीन” में हुआ है और इसमें अंजीर से कसम (शपथ) खायी गयी है।

 

  • बेरी :  बेरी का अरबी नाम ”सिदरह” है। बेरी के पेड़ की लकड़ी ईंधन के काम में आती है। बेरी के पेड़ को बाड़ के तौर पर लगाया जा सकता है। इसके फल खाये भी जाते हैं। फल व पत्तियाँ औषधि के काम में भी लायी जाती हैं। सिदरह के नाम से बेरी का उल्लेख कुरान शरीफ में तीन बार किया गया है। कुछ विद्वानों ने सिदरह को ऐसा पेड़ बताया है जो देवदार की तरह होता है, जिसको अंग्रेजी में सीदार भी कहते हैं। यह लेबनान का पेड़ है।

 

  • शजरे मिसवाक  (पीलू) : शजरे मिसवाक की लकड़ी में नमक और खस किस्म का रेजिन (Resin) पाया जाता है। जो दाँतों में चमक पैदा करता है। मिसवाक करने से जब इसकी एक तह दाँतों पर जम जाती है तो कीड़े (Bacteria) आदि से दन्त सुरक्षित रहते हैं। इस प्रकार चिकित्सकीय दृष्टि से मिसवाक दाँतों के लिए बहुत लाभदायक है। पीलू को कुरान शरीफ में सूरह सबा में खम्त का नाम दिया गया है।
    • हज़रत मोहम्मद साहब ने मिसवाक के दस फायदे बताये हैं। मिसवाक मुँह को खुशबूदार करती है, मसूढ़ों को मजबूत करती है, नजर को तेज करती है, बलगम निकालती है, सोजिश दूर करती है, भूख बढ़ाती है, इत्यादि। हज़रत मोहम्मद साहब ने मिसवाक करने पर जोर दिया है और हो सकता था कि हर नमाज से पहले इसको फर्ज कर दिया जाता था।
  • मेहंदी : मेहंदी का पेड़ भारतीय समाज में बड़ा महत्त्व रखता है। इसके फूलों से ‘इतरे-हिना’ हासिल किया जाता है, जो अपनी खुशबू से दिल व दिमाग दोनों को ताजगी पहुँचाता है। शादी विवाह एवं दूसरे धार्मिक त्यौहारों और दावतों में इसका इस्तेमाल जरूरी समझा जाता है। हिना  (मेहंदी) की पत्तियों से खेजाब बनाना, औरतों के हाथ पैर की मेहंदी के रंगों से सजाना, आज भी हमारे समाज में बहुत लोकप्रिय है, मेहंदी के पेड़ अधिकतर लोग अपने घरों में लगाते हैं। शादी के अवसर पर वर-वधू को मेहंदी लगायी जाती है। हज़रत मोहम्मद साहब ने फरमाया कि ”अल्लाह के नज़दीक दरख्त (पेड़ों) में निहायत प्यारा पौधा मेहंदी (हिना) का है।” कुरान शरीफ की सूरा ”देहर” की आयज में काफूर का उल्लेख किया गया है, जिसको बाज़ विद्वानों ने हिना भी बताया है।

जब कभी हज़रत मोहम्मद साहब को जख्म होता या काँटा चुभ जाता तो आप उस पर मेहंदी (हिना) का लेप लगाया करते थे।

 

  • बबूल : बबूल की एक किस्म जो अरब में पायी जाती है, उसे ”तलहा” कहते हैं और इसी नाम से कुरान शरीफ की सूरह ”वाक्या” में बबूल का उल्लेख किया गया है। तलहा को कुछ लोग केले का पौधा भी कहते हैं। भारत में इसे बबूल या केकड़ भी कहते हैं। इसके पेड़ से गोंद निकाली जाती है। आर्थिक लाभ के लिए पेड़ को लगाना लाभदायक होता है। इसकी गोंद विश्व के अनेकों व्यापारिक प्रतिष्ठनों में प्रयोग में लायी जाती है। इसकी गोंद केक, पेस्ट्रीज़, आईस्क्रीम और अन्य पेय पदार्थों के अतिरिक्त दवाओं, पेण्ट और स्याही वगैरह में भी इस्तेमाल होती है। बच्चे के जन्म के बाद माता को ताकत मिलती है। चिकित्सकीय दृष्टि से यह एक बेहतरीन कार्बोहाइड्रेट पौलीमर है, जिसमें डी-गैलेक्टोस एल-अरैबिनोज़ व यूरोनिक एसिड है।

 

  • तुलसी : तुलसी की एक किस्म को कुरान शरीफ में दो बार ”रेहान” के नाम से उल्लेख किया है। तुलसी  (रेहान)  की पत्तियाँ और फूल दोनों ही खुशबूदार होते हैं। इनसे खुशबूदार तेल निकाला जाता है, जिसमें मेथाइल सिन्नामेट, लिनालूल और टरपीनेन के तत्त्व मिलते हैं। इसके फूल और पत्तियाँ दोनों ही स्टीमुलेण्ट, कार्मिनेटिव, डेमल्सेण्ट हैं, पूरा पौधा ही कीटाणुनाशक की खुसूसियत रखता है। इसके बीज यूनानी औषधि में मेदे की तकलीफ में दिये जाते हैं। ये बीज निहायत लोआबदार होते हैं। ये जिरयान और पेचिश जैसे रोगों की अचूक दवा है। यह खाँसी में भी बहुत लाभदायक है।