Budhha Vatika


Budhha Vatika – बुद्ध वाटिका

(भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़े वृक्षों का रोपण) हे भिक्षुओं। यह सामने वृक्षों की छाया है, ……. ध्यान करो, प्रमाद मत करो।

भगवान बुद्ध:  भगवान बुद्ध के जीवन की सभी महत्त्वपूर्ण घटनायें वृक्षों की छाया में घटीं। जन्म शाल वन में एक वृक्ष की छाया में, प्रथम समाधि जामुन वृक्ष की छाया में, बोधि प्राप्ति पीपल वृक्ष की छाया में व महानिर्वाण शाल वृक्ष की छाया में हुआ। यही नहीं गृह त्याग से महानिर्वाण तक का लगभग 52 वर्ष का पूरा जीवन काल वन व वृक्ष के सानिध्य में ही बीता। भ्रमण के दौरान भी वे सामान्यतया वन या बाग में ही रुकते थे। भोजन के उपरान्त वे सदैव ध्यान के लिए वन में चले जाते थे। प्रात:कालीन ध्यान के बाद वन- वृक्षों के बीच भ्रमण करते हुए चलित- ध्यान करना उनका नित्य का नियम था।

बुद्ध से जुड़े विशेष वृक्ष

  • पीपल (बोधिवृक्ष) : इस वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए भगवान बुद्ध को बैशाख पूर्णिमा की रात्रि में बोधि की प्राप्त हुई थी। हिन्दू और बौद्ध दोनों ही धर्मों का यह सबसे अधिक सम्माननीय पवित्र वृक्ष है। गया (बिहार) स्थित भगवान बुद्ध के उस मूल बोधि वृक्ष की शाखा श्री लंका में रोपित की गयी थी, उसी वृक्ष की शाखा से तैयार वृक्ष आज विश्व के अनेक बौद्ध स्थलों की शोभा बढ़ा रहे हैं जिसका एक वृक्ष सारनाथ में भी स्थापित है। हिन्दू मान्यता में भी स्थापित है। हिन्दू मान्यता में इस वृक्ष को भगवान विष्णु का रूप माना जाता है। इस वृक्ष का वैज्ञानिक नाम फाइकस रिलिजिओसा है।
  • शाल (साखू) : भगवान बुद्ध के जीवन काल में उनकी लीला भूमि में साल वनों का साम्राज्य था। उनका अधिकांश समय इन्हीं साल वनों के सानिध्य में बीता। शालीनता व विशालता में निहित शब्द- खण्ड शाल के भाव से इस वृक्ष का नाम शाल पड़ा जिसका अर्थ है ऊँचा, महान्। शाल वास्वव में उत्तर भारत के वनों का गौरव है, शक्तिशाली प्रकाष्ट के कारण सागौन की तरह इसे भी शाक कहा गया जो उत्तर भारत में बिगडक़र साखू बन गया। उनका जन्म लुम्बिनी के साल वन में बैशाख पूर्णिमा को हुआ था। कहते हैं प्रसव के समय गौतम बुद्ध की माँ (महामाया) अपने दाये हाथ में शाल की झुकी हुई शाखा को सहारे के लिये पकड़े हुई थी। शरीर के त्याग के लिये भी भगवान ने कुशीनगर स्थित शाल वन चुना। एक जुउ़वाँ शाल वृक्ष की छाया में उत्तर की ओर सिरहाना कर उनकी चारपाई बिछाई गयी थी, वह भी वैशाख पूर्विमा की तिथि थी, उस समय भी शाल पुष्पित थे। इस वृक्ष का वैज्ञानिक नाम शोरिया रोबस्टा है।
  • बरगद : भगवान बुद्ध ने अपने साधना काल में निवास के लिए अधिकतर इसी वृक्ष की छाया चुनी। बोधि प्राप्ति से पूर्व अजपाल नामक बरगद के नीचे निवास करते थे, यहीं सुजाता की खीर ग्रहण की थी, बोधि प्राप्ति के बाद इसी वृक्ष के नीचे आकर एक सप्ताह तक ध्यान किया था, इसके बाद पास के ही मुचवलिन्द नामक बरगद के नीचे भी एक सप्ताह ध्यान किया था। धर्म प्रवर्तन के लिए सारनाथ जाने से पहले भगवान फिर अजपाल बरगद के नीचे आकर रूके व धर्म प्रचार के संकल्प से अनुप्राणित हुए थे। बोधि प्राप्ति के बाद के पांचवें वर्ष में ये कपिलवस्तु के न्योग्रोधाराम (न्योग्रोध= बरगद) में ठहरे थे।
  • जामुन : बुद्ध की प्रथम समाधि का छाया वृक्ष। उन दिनों वर्ष में एक दिन खेत में हल चलाने का उत्सव (हलकर्षणोत्सव) मनाया जाता था। इसे देखने किशोर राजकुमार सिद्धार्थ जब खेत में गये तो खेत में स्थित जामुन के पेड़ की छाया में लगे आसन पर इन्हें समाधि लग गयी थी।
  • खिरनी (राजयतन, वैज्ञानिक नाम- मैनिलकारा हेक्जेन्ड्रा) : यह चिकनी छोटी पत्ती वाला ऊँचा वृक्ष है जिसका फल खाया जाता है। बोधि प्राप्ति के बाद का सातवां सप्ताह भगवान ने इस वृक्ष के नीचे ध्यान में बिताया था तथा 46 दिन का उपवास तोडक़र तपस्सु और भल्लिक नाम के दो व्यापारियों को अपना प्रसिद्ध प्रथम द्विवचनीय उपदेश (बुद्ध शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि) प्रदान किया था।
  • पाकड़ (प्लक्ष) : भगवान बुद्ध द्वारा इस वृक्ष के नीचे बैठकर उपदेश देने के दृष्टांत मिलते हैं। कम ऊँचाई पर भूमि के समानान्तर फैली शाखाओं वाले इस छायादार वृक्ष को पथिकों द्वारा विशेष रूप से पसन्द किया जाता है। कुछ लेखकों का मानना है कि साल वन में प्रसव के समय महामाया ने दायें हाथ से जिस वृक्ष की टहनी को पकड़ रखी थी वह पाकड़ था।